एक ही विषय पर 5 शायरों का अलग नजरिया….
Va हर नज़रिए पर मेरा अपना एक अलग नज़रिया
bold Mein जरूर पढें :-
1- *Mirza Ghalib*: 1797-1869
“शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर
या वो जगह बता जहाँ ख़ुदानहीं
इबादत करने दे , राहुल मुझे नशे में रह कर …
या वो काम बता दे जिसमें नशा ना हो ….
2- *Iqbal*: 1877-1938
“मस्जिद ख़ुदा का घर है, पीने की जगह नहीं , काफिर के दिल में जा, वहाँ ख़ुदा नहीं।”
ये जहाँ खुदा का घर है .. मस्जिद सिर्फ़ नहीं. …
काफ़िर हुआ तो क्या वो इस जहाँ में वो नहीं ..
3- *Ahmad Faraz*: 1931-2008
“काफिर के दिल से आया हूँ मैं ये देख कर, खुदा मौजूद है वहाँ, पर उसे पता नही
काफ़िर के दिल में झाँक और गुफ़्तगू कर ले ….
उसका खुदा कोई और है बस तुझको पता नहीं… …….
4- *Wasi*:1976-present
“खुदा तो मौजूद दुनिया में हर जगह है,
तू जन्नत में जा वहाँ पीना माना नहीं
खुदा की दुनिया को जन्नत से कम ना मान….
जहाँ जी करे राहुल
बस तू पी वहीं बैठ कर..
5- *Saqi*: 1986-present
“पीता हूँ ग़म-ए-दुनिया भुलाने के लिए,
जन्नत में कौन सा ग़म है इसलिए वहाँ पीने में मजा नही।”…..
ग़म का बहाना ना कर पीने के लिए राहुल…..
ख़ुशी भी एक नशा जिसे तू ढूँढता फिरे