माँ सी माँ….

हे ईश्वर तेरी रचना व सृष्टि पर कब किसने सवाल उठाए …

हर हाल में तुझे धन्यवाद दे ये इंसा अपना जीवन बिताए …

पर तेरी बनायी सृष्टि में कुछ पेंच मेरी समझ नहीं आये..

यकायक मेरे मन ने कई सवाल उठाए….

माँ की ममता से तूने हर बच्चे को नवाज़ा

फिर उम्र के अंतिम पड़ाव में माँ को भी बच्चा सा ही बनाया ..

किंतु किंतु किंतु

ममता का ज़िम्मा ईस अवस्था में तूने किसी को नहीं थमाया….

क्यूँ नहीं हमें (बेटों को) भी तेरी व्यवस्था में माँ सा बनाया …

क्यूँ नहीं तूने बेटों को ममता के उपहार से नवाजा

क्यों नहीं क्यूँ नहीं हम माँ की माँ सा बन सकते…..
कहाँ से लाएँ हम माँ के लिए
वो माँ सा प्यार
वो वो माँ सा दामन
वो माँ सी ममता
वो माँ सी फ़िकर
वो माँ सा जिगर

कहाँ से लाएँ हम अपने में वो
वो माँ सी माँ
माँ के लिए????

मेरा सलाम शायरों के नाम

एक ही विषय पर 5 शायरों का अलग नजरिया….

Va हर नज़रिए पर मेरा अपना एक अलग नज़रिया

bold Mein जरूर पढें :-

1- *Mirza Ghalib*: 1797-1869

“शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर

या वो जगह बता जहाँ ख़ुदानहीं

इबादत करने दे , राहुल मुझे नशे में रह कर …

या वो काम बता दे जिसमें नशा ना हो ….

2- *Iqbal*: 1877-1938

“मस्जिद ख़ुदा का घर है, पीने की जगह नहीं , काफिर के दिल में जा, वहाँ ख़ुदा नहीं।”

ये जहाँ खुदा का घर है .. मस्जिद सिर्फ़ नहीं. …

काफ़िर हुआ तो क्या वो इस जहाँ में वो नहीं ..

3- *Ahmad Faraz*: 1931-2008

“काफिर के दिल से आया हूँ मैं ये देख कर, खुदा मौजूद है वहाँ, पर उसे पता नही

काफ़िर के दिल में झाँक और गुफ़्तगू कर ले ….

उसका खुदा कोई और है बस तुझको पता नहीं… …….

4- *Wasi*:1976-present

“खुदा तो मौजूद दुनिया में हर जगह है,

तू जन्नत में जा वहाँ पीना माना नहीं

खुदा की दुनिया को जन्नत से कम ना मान….

जहाँ जी करे राहुल

बस तू पी वहीं बैठ कर..

5- *Saqi*: 1986-present

“पीता हूँ ग़म-ए-दुनिया भुलाने के लिए,

जन्नत में कौन सा ग़म है इसलिए वहाँ पीने में मजा नही।”…..

ग़म का बहाना ना कर पीने के लिए राहुल…..

ख़ुशी भी एक नशा जिसे तू ढूँढता फिरे