हल्का होना भी हुनर है साहब,
हर बोझ को हँसी में उड़ाते हैं,
गहरे तो समंदर ने लिखे हैं किस्से,
हम किनारे पर अल्हड़ लहर बन जाते हैं।
अपनी मस्ती में रहते जो आ जाये उसी सांग खेलते है
अपनी उचाईयों को छूते हैँ और फिर समंदर में समा जातें हैँ
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20 Oct 2026 Leave a comment
हल्का होना भी हुनर है साहब,
हर बोझ को हँसी में उड़ाते हैं,
गहरे तो समंदर ने लिखे हैं किस्से,
हम किनारे पर अल्हड़ लहर बन जाते हैं।
अपनी मस्ती में रहते जो आ जाये उसी सांग खेलते है
अपनी उचाईयों को छूते हैँ और फिर समंदर में समा जातें हैँ