रंगों की मधुशाला
रंग रंग का प्याला भर-भर कर,
आज आए हर कोई मिलने वाला
जो रंग दिखे उसमें तुझको,
तू वैसा ही बन जा भोला भाला
हर हँसी में मधु घोल,
हर आँसू में शीतल ज्वाला,
जो जैसा खोजे तुझमें,
पा जाए वैसी ही मधुशाला।
हर रंग में रंग जा
हर रंग को जी जा
हर रस को पी जा
बनाके उसको मधु का प्याला,
जो चाहे जैसा मिले उसको
वैसा ही तेरा प्याला
जो जैसा खोजे तुझमें,
पा जाए बस वैसी ही मधुशाला।
राहुल आनंद
स्टाइल क्रेडिट – मधुशाला
हरिवंश राय जी बच्चन
जीवन के कटु सत्यों की आज बना लाया मै माला
प्रियतम अपनी बातों से आज दिखाऊंगा मै जग की ज्वाला
पहले थोड़ा सुन लूँ खुद को फिर ये जग सुन पायेगा
सब से पहले अपने खुद के रंग दिखलाती मेरी मधुशाला
मृग तृष्णा सी तृष्णा लेकर ना आना तुम मेरे पास
तड़प उठे मन तृष्णा से प्रिय, तब तुम आना मेरे पास
जीवन का सब सार निचोड़कर पूरी निकालूंगा हाला
मन की बातों से भरकर ले आऊँगा तेरा प्याला
जग की कटुता को तो कँठ में कब से धार चूका हूँ मैँ
मन की मधुता भी तुझ पे कब का वार चूका हूँ मैँ
आज मिला मौका मुझको साफ करूँगा मन जाला
आज उड़ेलूंगा मैं तुझ पर मन के रंगों की अपनी मधुशाला
जीवन के संघर्षों से घोल बनी तू मेरी प्यारी हाला
तेरे अनुभव भर के अपने जीवन में बनता हूँ मैं पीने वाला
खूब छकाया तूने मुझको बल का छल का पान कराया
बदरंगी इस दुनिया से मैं चुरा लाया रंगों का प्याला
मैं तेरा तू मेरी यारा बन जाएं एकदूजे के मन की मधुशाला
संवेदनशील जीवन रेखाओं से खींच लाया वास्तविक हाला
बुद्धिहीन मैं अशिष्ट, कवि बन ले आया अनुभवों का प्याला
क्षमा क्षमा बस मैं मांगू हरी से, बच्चन मान क्षमा धरना…
प्रण है,कभी न कण-भर खाली होगा तेरी मधुशाला का प्याला
उस समय पिए इस समय पिएं पाठक सब हैँ पीने वाले
दस्तक देता, द्वार पर तेरे, इस पल मैं, नई है मेरी मधुशाला