वहम है
ग़ालिब
तू किसे समझता है अपना

फ़हम
भी ग़लत है आशियाने का इक़बाल…..

अहम है
जो मानने नहीं देता
वर्ना परिंदो में
है क़ोयल भी बेशुमार……

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